|

गृह युद्ध की ओर नेपाल

नेपाल की अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री प्रंचड, देश का नहीं,माओवादी गुटों और लडाकों का नेतृत्व कर रहे हैं| प्रचंड के नेतृत्व में संविधान सभा को अभी नेपाल का संवैधानिक और लोकतांत्रिक ढांचा तैयार करना हैं, लेकिन नेपाल को बार-बार विवादों में धकेला जाता रहा है| प्रचंड कभी भारत के साथ करीब 59 साल पुरानी मैत्री की संधि को रद्द कर उसे नए सिरे से लिखना चाहते हैं, कभी ज्योतिर्लिंग पशुपतिनाथ  मंदिर के पंरपरागत भारतीय पुजारियों को हटानें का फैसला लिया जाता है, चीन की ओर से प्रचंड सरकार की निष्ठाएं लगातार स्पष्ट हो रही हैं| चीन के चंपू के तौर पर प्रधानमंत्री  काम कर रहे हैं, लेकिन नेपाल के सेनाध्यक्ष कटवाल को वर्खास्त करने के ताजातरीन फैसले के बाद नेपाल में गृह युद्ध की नौबत आ सकती है| सिर्फ तीन माह बाद रिटायर होने वाले सेना प्रनुख ने कैबिनेट के फैसले को खारिज कर दिया है| वह सर्वोच्च न्यायालय की चौखट पर जाएंगे| सेना के आला अफसरों की गुप्त बैठकों में प्रचंड सरकार के खिलाफ बगावत पर विर्मश जारी है| लडखडाती और अपंग सरकार का तख्ता पलट भी किया जा सकता है| प्रमुख दल कांग्रेस और माओवादी एक-दूसरे के सामने सडको पर उतर आए हैं| भारतीय मूल के राष्ट्रपति यादव ने प्रचंड कैबिनेट के इस फैसले पर असहमति जताते हुए फिलहाल उसे नामंजूर कर दिया है, क्या अब भी कट्टर माओवादी प्रचंड की आंखें नही खुली हैं? क्या उन्हे भविष्य की चेतावनी का एहसास नही हुआ हैं? क्या उन्हें भारत की खुली सरहदों का खौफ और आर्थिक मदद वापस खींच लेने की चिंता नहीं है? क्या नेपाल ने सेना की स्वायत्तता और लोकतंत्र को लेकर माओवादी सरकार की दृष्टी और सोच का सच यही है? क्या प्रचंड चीन के माओवादी एजेंडे के मुताबिक चलना चाहते हैं? नेपाली सेना में यह दखल महज उस देश का ही मुद्दा नहीं है, उसके फलितार्थ भारत और चीन को प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करेंगे| हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिहं नेपाल के हालात पर भारत की चिंता जता चुके है| दरअसल प्रधानमंत्री बनने से पहले ही प्रचंड लगातार आग्रह करते रहे हैं कि करीब 19000 माओवादी लडाकों को नेपाली सेना में भर्ती किया जाए| यह मांग तब भी बार-बार उभरी थी, जब नेपाल के राजा ज्ञानेंद्र के साथ माओवादी नेताओं की युद्धविराम संबधी चर्चा हुई थी| न तो तत्काल बने राजा और न ही उनके कार्यकाल में सेनाध्यक्ष बने कटवाल इस पक्ष में थे कि कारीब 40000 नेपाली सेना का हिस्सा माओवादियों को भी बनाया जाए| सवाल निष्ठाओं का था| देश और सीमाओं की सुरक्षा की अपेक्षा वफादारी चीन के प्रति हो सकती है| 1962 में जब चीन के हमले में भारत बुरी तरह पराजित हुआ था, तो तब के नेपाली राजा महेंद्र ने दोस्ती का हाथा बढाया था| चीन से उसका फायदा भी हुआ| महेंद्र के उत्तराधिकारी राजा वीरेंद्र भी भारत की बजाय चीन समर्थक थे, लेकिन अजीब विरोधाभास है कि नेपाल का कारोबार उसकी अर्थव्यस्था, बुनियादी जरुरतें आदि भारत पर आश्रित  है| अलबत्ता माओवादी सत्ता के बाद नेपाल का परिदृश्य लगातार बदल रहा है| माओवादी संर्घष के बाद नेपाल का एकमात्र हिंदू राष्ट्र का दर्जा और राजशाही तो समाप्त हो गए, लेकिन क्या प्रचंड ऐसे लोकतंत्र की बुनियाद रखेंगे, जिसमे सत्ता और सेना आमने-सामने हों|  

दिव्य हिमाचल से साभार

Leave a Reply