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हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर का धौलाकुंआ रेशम उत्पादन में अग्रणी

नाहन: धौलाकुंआ क्षेत्र के कई उद्यमी रेशम उत्पादन में अपना भाग्य आजमा रहे हैं | जिला के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा धौलाकुंआ के लोग सेरीकल्चर के क्षेत्र में चलाई जा रही गतिविधियों में अधिक दिलचस्पी ले रहे हैं | धौलाकुआं के दलीप सिहं तथा ध्यानो देवी, भेडोंवाला के सावन राम और माजरा के रांझा राम कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्होने जिला उद्योग केन्द्र द्वारा संचालित सेरीकल्चर योजना की विभिन्न गतिविधियां आरम्भ की हैं |
यह जानकारी देते हुए जिला उद्योग केन्द्र के प्रबन्धक बी.एस. बिष्ट ने बताया कि चालू वित्त वर्ष के दौरान अभी तक इन गतिविधियों में शामिल 418 व्यक्तियों को रेशम के लिए कोकून उपलब्ध करवाए गये हैं |
उन्होने बताया कि जिला उद्योग केन्द्र द्वारा 35.25 एकड भूमि में दो पौधशालाएं एवं सात शहतूत उपवन स्थापित किये गये हैं | इन उपवनों में लगाए गए पौधों की कुल संख्या 48,395 है | पौधशालाओं में रोपित की जाने वाली कटिंग्स की संख्या 1.80 लाख है | पुरुवाला में स्थापित पौधशाला में एक लाख रोपित कटिंग्स, जबकि पडदूनी में 80 हजार कटिंग्स हैं | जिला के 118 गांव रेशम कीट संबंधी तथा शहतूत पौधारोपण गतिविधियों में सलग्न हैं |
विष्ट ने बताया कि एक औंस रेशम कीट के उत्पादन के लिए 250 वर्ग फुट क्षेत्र की जरुरत होती है | एक औंस कोकून के लिए 800 से 900 कि. ग्रा. पत्तियां दरकार होती है और एक औंस रेशम बीज से 40 कि. ग्रा. हरा कोकून पैदा किया जा सकता है | हरे कोकून का मूल्य 100 रुपए प्रति कि. ग्रा. जबकि सूखे कोकून का मूल्य 300 रुपए प्रति कि.ग्रा. होता है |

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