विवाह का विज्ञापन
आपने विवाह के बहुत से विज्ञापन पडे होंगे, कुछ जगह पत्र व्यवहार भी किया होगा, मगर इसकी असलियत से शायद ही वाकिफ हों. विवाह का यह विज्ञापन नही पढा तो…कभी आकिफ भी नही हो पायेंगे |
न तो मेरा विवाह का कोई इरादा था और न सोच ही रहा था, लेकिन क्या करुं जब विपत्ति आती है तो जबर्दस्ती आ धमकती है | प्रात्: अखबार पढ रहा था | एक विज्ञापन से मेरी नजर जा टकरायी | मैं आकृष्ट हुआ और एक नवयुवक होने के नाते खानबहादुर साहब को को एक पत्र लिख बैठा | विज्ञापन इस प्रकार था | “एक नौजवान, पढी-लिखी, सुंदर रईसजादी के लिए एक ऐसे वर की आवश्यक्ता है जो चाहे रोजगार में हो या न हो, अधिक पढा लिखा हो या न हो, परन्तु खानदानी और शरीफजादा अवश्य हो | सबसे बढकर नफासत पसंद, हंसमुख और विनोदप्रिय अवश्य हो | उम्मीदवार को पंद्रह दिन हमारे यहां मेहमान की हैसियत से रहना पडेगा, जिससे हम उसकी नफासत का जायजा ले सकें |
खानबहादुर साहब का पत्र मुझे आशा से जल्दी प्राप्त हुआ | उन्होने मुझे पंद्रह दिन के लिए अपने घर पर बुलाया, अतएव मैं खान बहादुर साहब के दौलत खाने पर जा पहुंचा | वहां मुझे एक अति सुंदर और आरामदेह कमरा ठहरने के लिए दिया गया | एक सुन्दर सा युवक मेरे पास आया और कहने लगा, आप इत्मीनान से स्नान आदि कर लें | दोपहर को भोजन पर खान बहादुर साहब से मुलाकात होगी |
मुझे एक नौकर बुलाने के लिए आया और कहने लगा, “खान बहादुर साहब ने याद फरमाया है|” मैं उनके कमरे में पंहुचा, वहां एक बुजुर्ग के अलावा कई सस्ते किस्म के कुछ नौजवान पहले से ही मौजूद थे | मुझे देखते ही खानबहादुर साहब ने बडी गर्मजोशी से फरमाया, “तशरीफ लाइए असलम साहब, कहिए सफर कैसा गुजरा ?”
अर्ज किया, “बडा आरामदेह गुजरा |”
खानबहादुर साहब ने सिगार का धुआं छोडते हुए कहा, “जब सफर आरामदेह गुजरे तो बडी रहमत रहती है | खैर, आपके कमरे में जरुरत की सारी चीजें मौजूद हैं या नही ?
“जी हां, सब कुछ मौजूद है |”
खानबहादुर साहब कहने लगे, “माफ कीजिएगा, मैने इन नौजवानों से आपका परिचय नही करवाया | ये सब मेरे इश्तहार को देखकर आये हैं | फिर वे एक-एक करके परिचय कराने लगे, ” इन साहिबान में ये हैं अंजुम साहब, जो आज ही वापस जा रहे हैं | हजरत दोनों पैरों को रखकर सोफे पर बैठते हैं | इन्हे अभी बैठना सीखना है | माशाअल्ला, वैसे बडे समझदार आदमी है | दूसरे ये हैं अहसान साहब, ये भी इनके साथ जा रहे हैं | इसका कारण है कि आप हरे सूट पर लाल टाई बांधते हैं, और ये तीसते है नसीम साहब, ये चाय पीते समय सी-सी की आवाज निकालते है | मैंने इन्हे राय दी है कि चाय पीना सीखिय |
हम सब खानबहादुर के साथ साथ खाने के कमरे में पंहुचे | जंहा मीठी-मीठी महक आ रही थी | खान बहादुर साहब ने सबसे पास वाली कुर्सी पर बैठने को कहा | हम सब खाने लगे | कोई साहब चिडिया की तरह धीरे-धीरे खा रहे थे | कोई साहब कांटा छुरी के पकडने में पूरी नफासत दिखा रहे थे | कोई साहब इस तरह खा रहे थे कि मुंह से जरा भी आवाज न निकले, मैंने वह तरीका अपनाया था कि जैसे खानबहादुर साहब खाते, वैसे ही मैं खाता, वे कांटे से पुलाव समेटते हाथ से निवाला बनाते, वैसे ही मैं करता |
खानबहादुर साहब और भी खुश होकर बोले, “बिल्कुल ठीक है इस अंग्रेजी सभ्यता ने तो पुलाव का मजा ही किरकिरा कर दिया है | मगर ये साहिबान तो यही चाहते है कि शोरबा भी कांटे से पिया जाये | वैसे देखा जाये तो मछली है, कबाब है, शौक से कांटे से खाइए, मगर पुलाव तो हाथ से ही अच्छा लगता है | मुझे ऐसा लगता है कि मानों इन्होने मेरा इश्तहार पढा नही है |”
खाने के बाद खान बहादुर साहब आराम करने के लिए अंदर चले गये और हम सब धूप सैंकने के लिए बाहर आ गए | अंजुम साहब ने दिल के गुबार निकालने शुरु कर दिए, “खुदा बचाए इस आदमी से, खासा सनकी है |” शकील मियां ने कहा, “सनकी नही ! बनता है, दौलत के नशे में अक्ल खो बैठा है |”
तीसरे पहर फिर चाय पर खान बहादुर साहब से मुलाकात हुई | वे कह रहे थे कि आपके ख्याल से कुत्ता पालना चाहिए या बिल्ली | सब ही की राय थी कि कुत्ता पालना चाहिए, क्योंकि यह एक वफादार जानवर है | मैंने बहुत झुककर धीरे से अर्ज किया, “मैं तो बिल्ली को अधिक पसंद करता हूं, क्योंकि नफासत पंसद है|”
खान बहादुर साहब उछल पडे, “भाई क्या बात पैदा की है | सौ बातों की एक बात है | कायल हो गया मैं भी | आप वाकई नफासत पसंद हैं |” चर्चा छिडी फूलों की सुन्दरता की, खान बहादुर साहब ने मुझे सम्बोधित करते हुए कहा, ऐसा लगता है मानो माली ने आपके कमरे में गुलदान नही सजाया है |”
अर्ज किया, जी हां, गुलदस्ते में फूल कुछ उदास हो जाता है | मुझे उस पिंजडे का ख्याल हो आता है, जिसमें फूल कैद किया गया है |”
खान बहादुर साहब ने अपनी आंखे गोल करते हुए कहा, “कितनी गहरी बात कही है | वाकई गुलदस्ते में कुछ देर के बाद फूल में वह रौनक नही रह्ती है |”
मैंने कहा, “मै तो फूल को हसीन तब ही तक समझता हूं, जब तक वह डाली पर रहता है | तोडने के बाद चाहे वह किसी जूडे में ही क्यों न गूंथा जाये, उसका सौंदर्य नष्ट हो जाता है |” खान साहब ने दाद दी |
इसके बाद अन्य उम्मीदवारों की ओर मुखातिब होकर कहने लेगे, “जिसकी मुझे तलाश थी, वह मिल गया, काश सचमुच मेरे कोई लडकी होती, जिससे मैं इनकी शादी कर सकता |” हम सब सन्नाटे में आ गए और पूछने लगे, “जनाब ने क्या फरमाया?”
खान बहादुर साहब ने एक जोर का कहकहा लगाया और कहा, “यह एक जबर्दस्त तफरी मुझे सूझी थी | इस विराने में अकेले रहते-रहते मैं घबरा गया था, मैने सोचा, चलो कोई फुलझडी छोड दूं |”
वर्ष 1985 के तारिका पत्रिका में प्रकाशित, शौकत थानवी द्वारा लिखित और एस. कुमार द्वारा अनुवादित
