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टाटा की लखटकिया आ गई, सडकें कब सुधरेंगी ?

टाटा ने आखिर आम आदमी की कार बना ही डाली | आम आदमी के हाथ यह अभी तक पहुंची नही है, पर दुनिया भर में हलचल मच गई है | आम आदमी की कार की पहली शर्त थी कि इसे सस्ती होनी चाहिए |जैसा कि आम सोच है, लोग सोच रहे थे कि अगर यह गाडी सस्ती होगी, तो जरूर घटिया होगी | लेकिन प्रदर्शनी में कार का माड्ल देखते ही लोगों को झटका-सा लगा | सस्ती तो है, पर घटिया कहीं से नही दिखी |
अब लोगों को शक है कि यह गाडी सस्ती भी नही होगी | इस गाडी का कंपनी ने नाम रखा है, नैनो | नैनो अति सूक्ष्म टेक्नोलाजी को कहते है | यानी कंपनी ने नाम में ही संकेत दे दिया है कि छोटी का मतलब घटिया नही , बल्कि इसमें टेक्लोलाजी की नई धार है | मतलब यह है कि यह पुराने जमाने की छकडा टाइप गाडी नही है | यह उस मारुति-800 से भी दो कदम आगे की गाडी है, जिसे बडी गाडियों वाले साबुन की टिकिया कहकर चिढाते हैं |

लेकिन पिछले पचीस-तीस सालों में मारुति ने मध्यमवर्ग को ‘बे-कार’ बना दिया | अब नैनो अगली पीढी को यही इज्जत बख्शने वाली है | पहले से थोडी ज्यादा चमक-दमक के साथ | पहले से थोडे ज्यादा फैशन के साथ | पहले से थोडे कम दाम में | अब हर दुपहिए वाला चौपहिए वाला बनने की जुगाड में लग जाएगा |
हर नई चीज पहले महानगरों में जगह बनाती है, क्योंकि वहां के लोगों को बाजार का चस्का लगा होता है | क्योंकि उन्हे बाजार की ज्यादा खबर होती है | बाजार उनके घर जल्दी दस्तक देता है, क्योंकि उनके घर उसके नजदीक पडते है | महानगरों के लोग भी पैस ज्यादातर खर्च करने के लिए कमाते हैं | बल्कि वह खर्च किए बिना रह ही नही सकते | खर्च तो बाकी जगह के लोग भी करते है, पर उनके पास पैसा भी कम आता है और बाजार भी | नैनो में यही फर्क है | यह गाडी दूसरे तीसरे नम्बर के शहरों के लिए बनाई गई है | अगले पांच सालों में इस शहरों के नजारे बदल जाने वाले हैं | सडकों, गलियों, रास्तों की हालत पहले ही खस्ता है | ऐसी स्थिति में नैनो का क्या हाल होगा ? आज हर किसी को जल्दी मची रहती है | नैनो इस जल्दबाजी की हवा निकाल देगी |
वैसे हिसाबी-किताबी लोग यह गिनती करने में भी जुट गए हैं कि नैनो की वजह से पेट्रोल की खपत कितनी बढेगी ? सरकारी कंपनियों को कितना घाटा उठाना पडेगा? मीडीया को इस कसरत में मजा आ रहा है | वह मोटाए जा रहे है, क्योंकि इससे खूब सनसनी पैदा हो रही है | हैरानी की बात तो यह है कि इस तरह का हिसाब बडी गाडियों के खर्चों को देखकर कभी नही निकाला जाता | बडी गाडियां सडक पर कितनी जगह घेरती है और उसमें कितनी सवारियां बैठती हैं जैसे सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं |

सार्वजनिक वाहनों में कितने जन ठूंसकर ढोए जाते हैं, माल असवाल की तरह? इस सवाल का जवाब भी नही मिलता | न कोई इसका हिसाब किताब रखना चाहता है | सच्चाई यह है कि सरकार को वे लोग भी अपनी हैसियत के मुताबिक पूरा टैक्स देते हैं |एक लाख के बाद आयकर के स्लैब तो सबके लिए बराबर हैं | और कुछ नही, तो यह तो याद रखा जाए कि यह देश उनका भी है | लेकिन नैनो-नैनो करके आटो-लारी सबको निशाना बनाया जा रहा है | एक तरह से आम आदमी को ही निशाना बनाया जा रहा है | असल में, यह आम आदमी को एम्पावरमेंट मिलते देख कर तिलमिलाने का माजरा है | हालांकि आम आदमी को इससे खुश नही हो जाना चाहिए | जैसे हर एम्पावरमेंट यानी शक्त अपने साथ खतरे भी लाती है, नैनो भी उनके गले की फांस ही बनने वाली है |
कुछ लोग लगे हाथ रतन टाटा और पर्यावरण के हिमायतियों को भी चपत लगाने से नही चूक रहे हैं | उनका कहना है कि टाटा ने यह कार बनाई ही क्यों ? आम आदमी का हिमायती बनने की क्या जरुरत थी ? दूसरे, पर्यावरणवादियों को तो विकासवादी हमेशा से रास्ते का रोडा ही समझते आए है | नैनो को देखकर पर्यावरणविदों ने भौंहे टेढी कीं, तो लोग उन पर टूट पडे |

रतन टाटा का कुछ भी कहना ठीक नही है | उनका काम नई कार लांच करना था, उन्होने कर दी | याद रखना चाहिए कि इस तरह की कार लाने के लिए उन्हे उकसाया किसने ? यह काम तो राजनेता ही कर सकता है | राजनेता ने ही शिगूफा छोडा था कि आम आदमी की कार बनाई जानी चाहिए | यह जनता को दिखाया गया हजार ख्वाबों की तरह का एक बडा ख्वाब था | लेकिन टाटा ने इस ख्वाब को हकीकत में बदल दिया | अब नैनो को चलाने के लिए सड्कें टाटा तो बनवाएगें नही ? न ही पर्यावरणविद बनवाएंगे | प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी के तहत सडकें तो सरकार ही बनवाती है | कार तो बन गई | बोतल से जिन्न बाहर आ चुका है | खैर इसी में है कि तमाम शहरों के चरमराते ढांचों को सुधारा जाए | वरना लेने के देने ही पड जाएंगे |

                                                                                                                                  (लेखक प्रसिद्ध हिंदी कवि है)

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